उस रात घर में बिजली चली गई थी। जुलाई की गर्मी, पंखे बंद, खिड़की से आती हल्की हवा भी गरम लग रही थी। मैं सोफे पर लेटा था, टी-शर्ट उतार के, सिर्फ़ बर्मुडा पहने। दीदी किचन में कुछ ढूँढ रही थीं—मोमबत्ती या टॉर्च।
दीदी 27 की थीं, मैं 24 का। वो दिल्ली से छुट्टियों में आई थीं। शादी की बातें चल रही थीं घर में, पर वो टालती रहती थीं। मुझे हमेशा लगता था कि दीदी के मन में कुछ और है—कुछ जो वो किसी से कह नहीं पातीं।
“अरे अंजलि, मिली कुछ?” मैंने आवाज़ दी।
“हाँ-हाँ, बस ये मोमबत्ती जला देती हूँ।”
वो आईं। सफेद स्लीवलेस नाइट गाउन में। बाल खुले, गले में हल्की सी चेन। मोमबत्ती जलाते वक्त उनकी उँगलियाँ काँप रही थीं—शायद गर्मी से, शायद कुछ और से। रोशनी उनके चेहरे पर पड़ी। आँखें चमक रही थीं।
मैंने जगह बनाई। “आ जा यहाँ बैठ। फर्श ठंडा लग रहा है।”
दीदी हिचकिचाईं, फिर सोफे के दूसरे छोर पर बैठ गईं। पैर मोड़कर। गाउन थोड़ा ऊपर सरका हुआ था। जाँघ की चिकनी त्वचा दिख रही थी। मैंने नज़र हटाई, पर दिल ने कहा—देख।
“नींद नहीं आ रही?” उन्होंने पूछा।
“नहीं। तुझे?”
“मुझे भी नहीं।” वो थोड़ा करीब सरकीं। “अजीब सी बेचैनी है आज।”
मैं चुप रहा। उनकी साँसें सुनाई दे रही थीं। मोमबत्ती की लौ हिल रही थी, उनके होंठों पर हल्की छाया पड़ रही थी।
“दीदी…” मैंने धीरे से कहा।
“हम्म?”
“तुझे कभी ऐसा लगा है… कि कोई बहुत करीब होना चाहता है, पर डर भी लगता है?”
वो मेरी तरफ़ मुड़ीं। आँखों में कुछ था—चमक, डर, चाहत।
“हाँ,” उन्होंने कहा। “बहुत बार।”
मैंने हाथ बढ़ाया। उनकी उँगलियाँ मेरी उँगलियों से टकराईं। ठंडी नहीं थीं—गरम थीं। जैसे आग छिपी हो। मैंने हल्के से उनकी हथेली दबाई। वो नहीं छुड़ाईं।
“अंजलि…” मैंने उनका नाम लिया, पहली बार ऐसे।
उन्होंने सिर झुका लिया। “ये गलत है ना?”
“पता नहीं,” मैंने कहा। “पर अभी ये सही लग रहा है।”
वो चुप रहीं। फिर धीरे से मेरे करीब आईं। उनका कंधा मेरे कंधे से लगा। मैंने उनका चेहरा अपनी तरफ़ मोड़ा। आँखें बंद थीं। मैंने उनके माथे पर होंठ रख दिए। बहुत हल्का। वो सिहर गईं।
“अंजलि… तू कितनी खूबसूरत है,” मैंने फुसफुसाया।
“चुप रह,” उन्होंने कहा, पर आवाज़ में गुस्सा नहीं था। चाहत थी।
मैंने उनके गाल पर किस किया। फिर होंठों के पास रुका। उनकी साँस मेरे होंठों पर लग रही थी। गर्म। मीठी।
“रुक जा… प्लीज़,” उन्होंने कहा।
मैं रुक गया।
“मुझे डर लग रहा है,” उन्होंने कहा। “अगर हम आगे बढ़ गए तो…”
“तो क्या?” मैंने पूछा।
“तो सब बदल जाएगा।”
मैंने उनकी कमर पर हाथ रखा। बहुत धीरे। वो काँप गईं।
“बदलने दो,” मैंने कहा। “मुझे तुझसे दूर रहना अब बर्दाश्त नहीं होता।”
उन्होंने मेरी आँखों में देखा। बहुत देर तक। फिर धीरे से मेरे होंठों पर अपने होंठ रख दिए। पहला चुंबन। नरम। काँपता हुआ। मैंने उन्हें और कस लिया। उनकी पीठ पर हाथ फेरने लगा। गाउन के कपड़े के नीचे उनकी त्वचा गरम थी।
“तेरी बॉडी… कितनी गरम है,” मैंने उनके कान में कहा।
“तेरी भी,” उन्होंने फुसफुसाया। “मुझे लग रहा है… मैं जल रही हूँ।”
मैंने उनका गाउन का पट्टा हल्का सा खींचा। कंधा नंगा हो गया। मैंने वहाँ किस किया। वो सिहर उठीं। उनकी उँगलियाँ मेरे बालों में फँस गईं।
“धीरे… अंजलि धीरे,” उन्होंने कहा।
मैं रुका। उनकी आँखों में देखा।
“तुझे अच्छा लग रहा है?” मैंने पूछा।
“बहुत,” उन्होंने कहा। “पर डर भी लग रहा है।”
मैंने उन्हें गोद में उठाया। बेडरूम की तरफ़ ले गया। बिस्तर पर लिटाया। मोमबत्ती की रोशनी अभी भी कमरे में थी। मैं उनके ऊपर झुका।
“मुझे बस तुझे महसूस करना है,” मैंने कहा। “तेरी साँसें, तेरी धड़कन, तेरी गर्मी।”
उन्होंने मेरी छाती पर हाथ रखा। “मुझे भी यही चाहिए। तू मेरे बहुत करीब हो जा… इतना करीब कि मैं तुझे अलग न कर पाऊँ।”
मैंने उनकी गर्दन पर किस किया। फिर कॉलर बोन पर। उनकी साँसें तेज़ हो गईं। मैंने उनकी कमर को छुआ। गाउन पूरी तरह सरक गया। उनकी जाँघें मेरी जाँघों से सटी हुई थीं। गर्माहट। एक-दूसरे में समाने वाली गर्माहट।
“अंजलि… तू मेरी है,” मैंने कहा।
“और तू मेरा,” उन्होंने जवाब दिया।
हम दोनों एक-दूसरे में खो गए। स्पर्श। साँसें। धड़कनें। वो तड़प जो सालों से दबी थी, आज बाहर आ गई। कोई जल्दबाज़ी नहीं। बस वो इच्छा। वो closeness। वो sex feeling जो शब्दों में नहीं आता।
रात भर हम बस महसूस करते रहे। कभी चुप। कभी नाम लेकर पुकारते। कभी सिर्फ़ साँसों से बात करते।
सुबह जब बिजली आई, हम दोनों अलग-अलग तरफ़ लेटे थे। पर हाथ अभी भी जुड़े हुए थे।
दीदी ने धीरे से कहा, “ये रात… हमेशा याद रहेगी।”
मैंने उनकी उँगलियाँ चूमीं।
“हाँ। और शायद… और रातें भी आएँगी।”
वो मुस्कुराईं। आँखों में वही चमक। वही डर। वही चाहत।
हम दोनों जानते थे कि ये रिश्ता आसान नहीं। पर उस पल में, सिर्फ़ वो रंगीन रात काफी थी।
और शायद… यही काफी होना चाहिए था।