Holi Sex Story : पिछले साल की होली थी। गाँव की गलियाँ रंगों से सराबोर थीं, भांग की मस्ती चारों तरफ छाई थी, और ढोल की थाप पर लौंडे-लौंडियाँ थिरक रहे थे। रानी, 24 साल की एक मस्त माल, अपने मायके आई थी। उसका गोरा बदन, भरी हुई चूचियाँ, और गोल-मटोल गांड देखकर गाँव के हर हरामी का लंड खड़ा हो जाता था। उसका पति शहर में नौकरी करता था, और वो अकेली होली मनाने गाँव पहुँची थी। लेकिन इस बार उसकी टक्कर अपने चचेरे भाई अजय से हुई, एक 28 साल का गठीला जवान, जिसका लंड किसी काले नाग की तरह मोटा, लंबा और जहरीला था।
सुबह होली की शुरुआत हुई। रानी ने टाइट सफेद कुर्ती और लहंगा पहना था, जो रंगों और पानी से भीगकर उसके बदन से चिपक गया। उसकी चूचियाँ कुर्ती से बाहर उभर रही थीं, निप्पल साफ दिख रहे थे, और गीला लहंगा उसकी मोटी जाँघों और गांड को ऐसे नंगा कर रहा था मानो वो किसी रंडी की तरह तैयार हो। अजय ने उसे देखा तो उसका लौड़ा पजामे में तंबू बन गया। उसने भांग का घूँट मारा और रानी के पास पहुँच गया। “साली, तू तो आज चूत की मालकिन लग रही है,” उसने गुलाल का थप्पड़ उसके गाल पर मारा और गंदी हँसी हँसा।
रानी ने आँख मारते हुए कहा, “अरे भोसड़ी के, हाथ नीचे रख। रंग लगाना है तो ढंग से लगा, हरामी।” अजय ने मौका देखा और गुलाल लेकर उसकी चूचियों पर रगड़ दिया। उसकी उंगलियाँ निप्पल को कुचल गईं। रानी की साँसें गरम हो गईं, “मादरचोद, ये क्या गंदा खेल शुरू कर दिया?” लेकिन उसकी आवाज में मज़ा था, गुस्सा नहीं। अजय ने उसकी कमर पकड़ी और अपनी ओर खींच लिया, “रंडी, आज तेरी चूत में होली खेलूँगा, रंग भी डालूँगा और लंड भी।”
रानी ने उसे धक्का मारा और हँसते हुए भागी, “चल हरामी, पकड़ ले तो तेरे लौड़े की ताकत देखूँ।” दोनों गाँव के पीछे खेतों की ओर दौड़े। वहाँ एक पुराना खंडहर था, जहाँ कोई झाँकने नहीं आता था। बारिश की फुहारें शुरू हो गईं, और रंगों से सना उनका बदन और भी गंदा और सेक्सी लग रहा था। अजय ने रानी को पकड़ा और खंडहर की दीवार से सटा दिया। उसने उसकी कुर्ती फाड़ दी, और रानी की भारी चूचियाँ बाहर लटक पड़ीं। “साली, क्या माल है तू, रंडी। इन चूचियों को तो चूस-चूसकर लाल कर दूँ,” उसने कहा और एक चूची को मुँह में भर लिया।
रानी सिसकारी लेने लगी, “आह्ह… भोसड़ी वाले… धीरे चूस… निप्पल काट मत, हरामी।” अजय ने उसकी दूसरी चूची को हाथ से मसला, निप्पल को चुटकी में दबाया और बोला, “रंडी, तेरे ये दूध तो भांग से भी नशीले हैं।” रानी की चूत गीली हो गई। उसने अजय के पजामे में हाथ डाला और उसका मोटा लंड पकड़ लिया। “मादरचोद, तेरा लौड़ा तो पाइप जैसा है। कहाँ डालेगा इसे, मेरी चूत फट जाएगी,” उसने गंदी बात करते हुए कहा। अजय ने हँसते हुए जवाब दिया, “साली, पहले तेरी चूत का भोसड़ा बनाऊँगा, फिर तेरी गांड को फाड़ूँगा।”
उसने रानी का लहंगा ऊपर उठाया और उसकी चूत पर रंग मल दिया। फिर अपनी दो उंगलियाँ अंदर पेल दीं। रानी तड़प उठी, “उफ्फ… हरामी… क्या कर रहा है… चूत में आग लग रही है… चोद दे अब।” अजय ने उसे घोड़ी बनाया और पीछे से अपना लंड उसकी चूत में ठूँस दिया। रानी की चीख निकल गई, “आह्ह… मादरचोद… फट गई मेरी… धीरे पेल, साले।” लेकिन अजय ने उसकी कमर पकड़ी और जोर-जोर से धक्के मारने लगा। थप-थप की गंदी आवाजें खंडहर में गूँज उठीं। रानी की चूत से पानी टपक रहा था, और अजय का लंड उसमें फिसल रहा था। “साली, तेरी चूत तो किसी रंडी की तरह चिकनी है,” उसने गाली दी।
फिर उसने रानी को उठाया और दीवार से सटाकर उसकी एक टाँग अपने कंधे पर चढ़ा ली। “अब तेरी चूत को सामने से चोदूँगा, रंडी,” उसने कहा और लंड फिर से पेल दिया। रानी की चूचियाँ हवा में उछल रही थीं, और वो चिल्ला रही थी, “आह्ह… चोद दे… मेरी चूत फाड़ दे… पूरा लंड डाल, हरामी।” अजय ने उसकी गांड पर थप्पड़ों की बौछार कर दी और बोला, “साली, तेरी गांड तो किसी कुतिया जैसी है। अब इसे भी चखूँगा।”
उसने रानी को जमीन पर लिटाया और उसकी गांड पर थूक लगाया। “नहीं… भोसड़ी के… गांड मत मार… फट जाएगी,” रानी ने चिल्लाकर मना किया। लेकिन अजय ने उसकी गांड में अपना मोटा लंड धीरे-धीरे सरकाया। रानी की आँखों में आँसू आ गए, “उफ्फ… मर गई… निकाल दे… हरामी।” लेकिन थोड़ी देर बाद दर्द मज़े में बदल गया। अजय ने उसकी गांड को चोदते हुए उसकी चूत में उंगलियाँ डाल दीं। रानी का बदन काँप उठा, “आह्ह… मादरचोद… क्या गंदा खेल खेल रहा है… चूत और गांड दोनों ले ले।”
तभी दूर से लड़कों की आवाजें आईं। होली का हुड़दंग पास आ रहा था। अजय और रानी ने जल्दी से कपड़े ठीक किए और अलग हो गए। लेकिन रानी की चूत अभी भी तड़प रही थी। उसने अजय को देखकर कहा, “रात को फिर मिल, हरामी। अभी मेरी चूत की आग बुझी नहीं।”
रात हुई। गाँव में ढोल बज रहे थे, लोग भांग के नशे में चूर थे। रानी और अजय चुपके से खेतों में मिले। अजय ने इस बार रानी को पेड़ से रस्सी से बाँध दिया। “साली, अब तेरी चूत को रंगों से भर दूँगा,” उसने कहा और उसकी चूत में गुलाल ठूँस दिया। फिर अपना लंड पेलकर चोदने लगा। रानी की सिसकारियाँ रात में गूँज रही थीं, “आह्ह… चोद दे… मेरी गांड भी फाड़… सब कुछ ले ले, मादरचोद।” अजय ने उसकी चूत को चोदा, फिर गांड में लंड डाला, और हर बार पोजीशन बदली। कभी उसे गोद में उठाकर चोदा, कभी घोड़ी बनाकर उसकी गांड पर थप्पड़ मारे।
अजय ने रानी को नीचे लिटाया और उसकी चूचियों को मसलते हुए कहा, “रंडी, अब तेरे मुँह में लंड डालूँगा।” उसने अपना लौड़ा रानी के मुँह में ठूँस दिया। रानी ने उसे चूसना शुरू किया, “उम्म… हरामी… कितना मोटा है तेरा लंड।” अजय ने उसके बाल पकड़े और मुँह को चोदने लगा। रानी का गला भर आया, लेकिन वो मज़े ले रही थी।
आखिर में अजय ने अपना रस रानी की चूचियों पर छोड़ दिया। “साली, तू तो किसी रंडी से कम नहीं। अगली होली तक तेरी चूत और गांड याद करेंगी,” उसने हँसते हुए कहा। रानी ने जवाब दिया, “मादरचोद, अगली बार तेरा लंड पहले चूसूँगी।”
उस रात होली का रंग सिर्फ बदन पर नहीं, उनकी वासना पर भी चढ़ गया। गाँव को कुछ पता नहीं चला, लेकिन रानी और अजय का ये गंदा खेल अब हर होली में चलने वाला था।