उस दिन घर में एक अजीब सा सन्नाटा था। माँ बाजार गई थीं, पापा ऑफिस, और छोटी बहन कॉलेज। मैं घर पर अकेला था, 22 साल का हो चुका था, लेकिन अभी नौकरी की तलाश में ही था। कंप्यूटर पर बैठा कुछ देख रहा था जब डोरबेल बजी। मैंने दरवाज़ा खोला तो आशा आंटी खड़ी थीं। माँ की पुरानी सहेली, 38-39 की होंगी, लेकिन दिखतीं 30 की लगती थीं। लाल साड़ी में, बाल खुले, गले में मंगलसूत्र। हाथ में एक थैला।
“अरे बेटा, माँ हैं क्या?” उन्होंने मुस्कुराकर पूछा।
“नहीं आंटी, वो बाजार गई हैं। आधे घंटे में आएँगी।”
“ओह, ठीक है। ये सामान रखवा देना उनको। मैं चलती हूँ।”
मैंने थैला लिया। लेकिन अंदर से एक आवाज़ आई—रुक जाओ। “आंटी, अंदर आ जाओ ना। चाय पी लो। माँ आने वाली हैं।”
वो हिचकिचाईं। फिर मुस्कुराकर अंदर आ गईं। “ठीक है, लेकिन जल्दी।”
हम ड्राइंग रूम में बैठ गए। मैं किचन में चाय बनाने गया। मन में कुछ हलचल हो रही थी। आशा आंटी को देखकर हमेशा से एक अजीब सा लगाव था। उनकी वो हँसी, उनकी वो कमर की मटक… पता नहीं कब से मन में घूमती रहती थीं। लेकिन कभी कहने की हिम्मत नहीं हुई।
चाय लेकर आया। वो सोफे पर बैठी थीं। साड़ी का पल्लू थोड़ा सरका हुआ था। उनका ब्लाउज गहरा कटा हुआ था। मैंने नज़र हटाई।
“चाय अच्छी बनी है,” उन्होंने पीते हुए कहा।
“शुक्रिया आंटी।”
चुप्पी छा गई। वो बाहर की तरफ़ देख रही थीं। मैं उनकी तरफ़। उनकी उँगलियाँ मग पर फिर रही थीं।
“बेटा, तू क्या करता है इन दिनों?” उन्होंने पूछा।
“बस, जॉब ढूँढ रहा हूँ।”
“अच्छा। और गर्लफ्रेंड?” वो हँस दीं।
मैं शर्मा गया। “नहीं आंटी।”
“क्यों? इतना हैंडसम लड़का… कोई नहीं पटाई?”
मैं चुप रहा। दिल तेज़ धड़क रहा था। वो मेरी तरफ़ देख रही थीं। आँखों में शरारत थी।
“आंटी… आप तो मजाक कर रही हो,” मैंने कहा।
“नहीं, सच में। तुझे देखकर लगता है… लड़कियाँ लाइन लगाती होंगी।”
वो थोड़ा करीब सरकीं। अब हमारी घुटने छू रहे थे। मैंने महसूस किया उनकी गर्माहट।
“आंटी… आप भी तो बहुत सुंदर हो,” मैंने हिम्मत करके कहा।
वो हँस दीं। “अरे, मैं तो बूढ़ी हो गई।”
“नहीं, बिलकुल नहीं। आप… आप तो किसी हीरोइन से कम नहीं लगतीं।”
वो चुप हो गईं। फिर धीरे से बोलीं, “सच में?”
“हाँ। बहुत दिनों से सोचता हूँ… आपसे कहूँ।”
उनकी आँखें मेरी आँखों में। मैंने देखा उनकी साँस तेज़ हो गई है।
“क्या कहना है?” उन्होंने फुसफुसाकर पूछा।
मैंने उनका हाथ पकड़ लिया। उंगलियाँ गर्म। वो नहीं छुड़ाईं।
“आंटी… मुझे आपसे attraction है। बहुत ज़्यादा। जब आप आती हो, तो मन करता है… बस आपको देखता रहूँ।”
वो सिर झुका लीं। “बेटा… ये गलत है। मैं तेरी माँ की सहेली हूँ।”
“पता है,” मैंने कहा। “पर ये जो desire है, वो रुक नहीं रही।”
वो चुप रहीं। फिर धीरे से मेरी तरफ़ मुड़ीं। मैंने उनका चेहरा अपनी तरफ़ मोड़ा। वो आँखें बंद कर लीं। मैंने उनके माथे पर किस किया। बहुत हल्का। वो सिहर गईं।
“आशा…” मैंने नाम लिया। पहली बार।
“हम्म?”
“मुझे डर लग रहा है,” मैंने कहा।
“मुझे भी,” उन्होंने कहा। “पर अच्छा भी लग रहा है।”
मैंने उनके गाल पर होंठ रख दिए। फिर कान के पास। उनकी साँस मेरे चेहरे पर लग रही थी। गर्म। मीठी।
“आंटी… आपकी बॉडी की गर्मी… मुझे पागल कर रही है,” मैंने फुसफुसाया।
वो मेरी छाती पर हाथ रख दिया। “तेरी भी। मुझे sex feelings हो रही हैं… बहुत तेज़।”
मैंने उन्हें अपनी बाँहों में ले लिया। वो मेरे सीने से लग गईं। मैंने उनकी पीठ पर हाथ फेरा। साड़ी के ब्लाउज के ऊपर से। उनकी त्वचा गरम थी। वो काँप रही थीं।
“धीरे… बेटा धीरे,” उन्होंने कहा।
मैं रुका। उनकी आँखों में देखा।
“आप चाहती हो?” मैंने पूछा।
“हाँ… लेकिन डर लग रहा है। अगर किसी को पता चल गया तो?”
“किसी को नहीं पता चलेगा,” मैंने कहा। “ये हमारा राज़ है।”
वो मुस्कुराईं। फिर धीरे से मेरे होंठों पर अपने होंठ रख दिए। पहला चुंबन। नरम। गहरा। मैंने उन्हें और कस लिया। उनकी जीभ मेरे होंठों पर सरकी। मैं सिहर उठा। हम दोनों काँप रहे थे।
मैंने उनकी साड़ी का पल्लू हल्का सा सरकाया। उनका ब्लाउज नजर आया। गहरा कटा हुआ। मैंने वहाँ किस किया। उनकी कॉलर बोन पर। वो सिर पीछे कर दीं।
“आह… बेटा,” उन्होंने फुसफुसाया।
मैंने उनके कंधे पर किस किया। फिर ब्लाउज का हुक खोला। एक-एक करके। उनका ब्रा दिखा। काला। मैंने वहाँ हाथ रखा। बहुत धीरे। वो सिहर उठीं। उनकी छाती ऊपर-नीचे हो रही थी।
“तेरी उँगलियाँ… कितनी गरम हैं,” उन्होंने कहा।
मैंने ब्रा का स्ट्रैप नीचे सरकाया। उनकी छाती नंगी हो गई। मैंने वहाँ होंठ रख दिए। धीरे से। वो मेरे बालों में उँगलियाँ फेरने लगीं।
“आशा… तुम कितनी खूबसूरत हो,” मैंने कहा।
वो मुझे अपनी तरफ़ खींचीं। मैं उनके ऊपर। वो बिस्तर पर लेट गईं। नहीं, हम सोफे पर ही थे। मैंने उन्हें गोद में उठाया। बेडरूम की तरफ़ ले गया। मेरा कमरा। दरवाज़ा बंद किया।
बिस्तर पर लिटाया। वो मेरी तरफ़ देख रही थीं। आँखों में आग।
“बेटा… मुझे छू,” उन्होंने कहा।
मैंने उनकी साड़ी पूरी उतार दी। उनकी पेटीकोट। उनकी जाँघें नंगी हो गईं। मैंने वहाँ हाथ फेरा। चिकनी। गरम। वो पैर मोड़ लीं।
“आह… और नीचे,” उन्होंने फुसफुसाया।
मैंने उनकी जाँघों के बीच हाथ रखा। उनकी पैंटी के ऊपर से। वो गीली हो गई थीं। मैंने महसूस किया उनकी गर्माहट। उनकी साँसें रुक सी गईं।
“बेटा… मुझे sex चाहिए… तेरे साथ,” उन्होंने कहा।
मैंने अपनी टी-शर्ट उतार दी। पैंट। वो मेरी बॉडी देख रही थीं। उनकी उँगलियाँ मेरी छाती पर। फिर नीचे सरकने लगीं। मेरी बॉक्सर पर।
“तू कितना मजबूत है,” उन्होंने कहा।
मैं उनके ऊपर आ गया। हमारी बॉडी एक-दूसरे से सटी। नंगी। गर्म। मैंने उनकी जाँघों पर किस किया। फिर ऊपर। उनकी छाती पर। वो मेरे नाम की रट लगा रही थीं।
“बेटा… और करीब आ,” उन्होंने कहा।
मैं उनके बहुत करीब आ गया। हमारी साँसें एक हो गईं। मैंने उनकी पैंटी उतार दी। उनकी योनि नंगी। गीली। मैंने वहाँ उँगलियाँ फेरीं। बहुत धीरे। वो काँप उठीं।
“आह… हाँ… ऐसे ही,” उन्होंने कहा।
मैंने अपनी बॉक्सर उतार दी। मेरा लिंग कड़ा हो गया था। वो उसे देख रही थीं। फिर हाथ से छुआ। गर्म।
“ये… कितना बड़ा है,” उन्होंने फुसफुसाया।
मैंने उनके ऊपर आकर उन्हें चूमना शुरू किया। उनकी योनि पर मेरा लिंग लग रहा था। गर्माहट। वो अपनी कमर ऊपर कर रही थीं।
“डाल दे… बेटा,” उन्होंने कहा।
मैंने धीरे से अंदर डाला। वो चीख सी गईं।
“आह… धीरे… दर्द हो रहा है,” उन्होंने कहा।
मैं रुक गया। फिर धीरे-धीरे हिला। वो मेरी पीठ पर नाखून गड़ा रही थीं। हम दोनों पसीने से तर।
“आशा… तुम्हारी योनि कितनी टाइट है,” मैंने कहा।
“तेरा लिंग… मुझे मार रहा है,” उन्होंने कहा।
हम दोनों एक लय में हिल रहे थे। तेज़। गहरा। वो मेरे नाम चिल्ला रही थीं। मैं उनकी छाती चूस रहा था। उनकी निप्पल कड़ी हो गई थीं।
“और तेज़… बेटा और तेज़,” उन्होंने कहा।
मैंने स्पीड बढ़ा दी। हमारा क्लाइमैक्स आ गया। वो चीखीं। मैं भी। हम दोनों थककर लेट गए।
रात भर हम ऐसे ही रहे। कभी किस करते, कभी स्पर्श। कभी फिर से sex।
सुबह माँ लौटीं तो हम अलग थे। लेकिन आँखों में वही आग।
“ये राज़ रहेगा,” उन्होंने कहा।
मैंने सिर हिलाया। लेकिन मन में सोचा—अगली बार कब?
और शायद वो बार बहुत जल्दी आएगी।