घर की वो पुरानी सीढ़ियां चढ़ते वक्त हर बार मेरे पैर थोड़े भारी हो जाते थे। दिल्ली की उस संकरी गली में हमारा मकान था, जहां बाहर की दुनिया से कटकर हमारा छोटा-सा परिवार रहता था। पापा की नौकरी दूर शहर में थी, मां दिन भर घर संभालतीं, और हम दोनों भाई-बहन – मैं, नेहा, 24 की, और मेरा छोटा भाई रोहन, 21 का। कॉलेज खत्म कर वो घर पर ही था, जॉब ढूंढ रहा था। बाहर से देखो तो सब सामान्य था। लेकिन अंदर, मेरे सीने में एक तूफान पल रहा था, जो हर रात थोड़ा और तेज हो जाता।
सर्दियों की शुरुआत थी। शाम ढलते ही ठंड इतनी बढ़ जाती कि कमरे में भी कंबल ओढ़े बिना सोना मुश्किल हो जाता। उस रात भी वैसा ही था। बिजली चली गई थी, सिर्फ मोमबत्ती की रोशनी कमरे में फैली हुई थी। मां जल्दी सो गईं, पापा फोन पर किसी से बात कर रहे थे। मैं और रोहन एक ही कमरे में थे – हमारा पुराना वाला, जहां दो बेड थे, लेकिन बीच में सिर्फ एक छोटी-सी दूरी। रोहन बिस्तर पर लेटा था, फोन स्क्रॉल कर रहा था। मैंने देखा, उसकी शर्ट का एक बटन खुला हुआ था, और कॉलर से उसकी गर्दन की वो गर्म त्वचा झांक रही थी। मैंने नजर फेर ली, लेकिन दिल की धड़कन रुकने का नाम नहीं ले रही थी।
“दी, ठंड लग रही है न?” उसने अचानक पूछा, बिना फोन से नजर हटाए। उसकी आवाज में कुछ अलग था – नरम, लेकिन गहरा। मैंने हल्के से सिर हिलाया। “हां… बहुत।” मैं बिस्तर पर बैठ गई, घुटनों को सीने से लगाकर। वो उठा, मेरे पास आया और कंबल मेरे कंधों पर डाल दिया। उसके हाथ मेरे कंधे पर रुके। बस दो सेकंड। लेकिन उन दो सेकंड में मेरी सांस रुक गई। उसकी उंगलियां गर्म थीं, और वो गर्मी मेरे शरीर में उतर गई। “बेहतर?” उसने पूछा। मैंने सिर्फ “हम्म” कहा। वो वापस अपने बिस्तर पर लेट गया, लेकिन अब उसकी नजर मुझ पर टिकी थी। सन्नाटे में सिर्फ मोमबत्ती की लौ का नाचना और हमारी सांसें।
उस रात मैं सो नहीं पाई। मन में हजार सवाल थे। “ये क्या हो रहा है? वो मेरा भाई है। फिर क्यों उसका स्पर्श मुझे इतना बेचैन कर देता है?” मैंने खुद को याद दिलाया कि ये गलत है, परिवार की इज्जत है, समाज है। लेकिन शरीर नहीं मान रहा था। उसकी सांसों की आवाज सुनकर मेरी चूत में हल्की सी सनसनी हो रही थी। मैंने जांघें आपस में दबाईं, लेकिन वो चाहत कम नहीं हुई।
अगले कुछ दिन ऐसे ही बीते। दिन में हम सामान्य थे। हंसते-बोलते, चाय पीते, टीवी देखते। लेकिन रात होते ही कुछ बदल जाता। वो मेरे पास आकर बात करने लगता। कभी मेरे बालों में उंगली फेरता, कभी कंधे पर हाथ रखता। हर बार मैं हिचकिचाती, लेकिन रोकती नहीं। एक शाम वो किचन में मेरे पीछे खड़ा हो गया। मैं चाय बना रही थी। उसने मेरी कमर पर हाथ रख दिया। हल्का सा। “दी, तू आज बहुत अच्छी लग रही है,” उसने कान में फुसफुसाया। मेरी सांस तेज हो गई। “रोहन… छोड़,” मैंने कहा, लेकिन आवाज कांप रही थी। वो हंसा, धीरे से। “क्यों? डर लग रहा है?” मैंने कुछ नहीं कहा। बस चुपचाप चाय छानती रही। लेकिन अंदर तूफान था। उसकी सांस मेरी गर्दन पर लग रही थी। मैंने महसूस किया कि मेरी चूत गीली हो रही है।
रात को जब हम बिस्तर पर थे, उसने फिर मेरी तरफ करवट ली। “दी, नींद नहीं आ रही?” उसने पूछा। मैंने कहा, “नहीं।” वो करीब आया। इतना करीब कि उसकी सांस मेरे चेहरे पर पड़ रही थी। “मुझे भी नहीं आ रही,” उसने कहा। फिर उसने मेरा हाथ पकड़ा। उसकी हथेली गर्म थी। मैंने हाथ नहीं छुड़ाया। वो धीरे-धीरे मेरी उंगलियां सहलाने लगा। “तुझे पता है दी, मैं तुझे बहुत प्यार करता हूं,” उसने कहा। मैंने आंखें बंद कर लीं। “मैं जानती हूं।” लेकिन वो आगे बढ़ा। “नहीं… वो वाला प्यार नहीं।” मेरे दिल की धड़कन रुक गई। “रोहन… ये गलत है,” मैंने कहा। वो चुप रहा। फिर बोला, “फिर भी… मैं रोक नहीं पा रहा।” उसकी आवाज में दर्द था, चाहत थी। मैंने कुछ नहीं कहा। बस उसका हाथ कसकर पकड़ लिया।
धीरे-धीरे वो और करीब आया। उसका हाथ मेरी कमर पर गया। मैं कांप उठी। “दी… बस एक बार छूने दे,” उसने कहा। मैंने सिर हिलाया। नहीं कहा हां, नहीं कहा ना। वो समझ गया। उसका हाथ मेरी कमीज के नीचे सरक गया। मेरी त्वचा पर उसकी उंगलियां। वो इतनी गर्म थीं कि मैं सिहर उठी। वो धीरे-धीरे मेरी पीठ सहलाने लगा। “तेरी स्किन कितनी सॉफ्ट है,” उसने फुसफुसाया। मैंने आंखें खोलीं। उसकी आंखों में आग थी। मैं डर गई, लेकिन साथ ही उत्सुक भी। “रोहन… अगर कोई देख लेगा?” मैंने कहा। “कोई नहीं देखेगा,” उसने कहा। फिर वो झुका और मेरे माथे पर किस कर दिया। वो किस इतना नरम था कि मेरी आंखों में आंसू आ गए।
उस रात हम बस इतना ही कर पाए। स्पर्श, किस, गले लगना। लेकिन वो काफी था। मेरे मन का संघर्ष शुरू हो चुका था। दिन में मैं खुद से नफरत करती। “मैं क्या कर रही हूं? ये मेरा भाई है।” लेकिन रात होते ही वो चाहत लौट आती। अगली रात वो और आगे बढ़ा। उसने मेरी कमीज के बटन खोले। मेरे स्तन बाहर आए। वो उन्हें देखता रहा। “दी… कितने खूबसूरत हैं,” उसने कहा। मैं शर्मा गई। वो धीरे से उन्हें छूने लगा। मेरे निप्पल सख्त हो गए। वो उन्हें सहलाने लगा, फिर मुंह में ले लिया। मैंने सिसकारी ली। “आह… रोहन…” वो चूसने लगा। मेरी चूत में आग लग गई। मैंने उसका सिर पकड़ लिया। वो नीचे उतरा। मेरी सलवार खींची। मैंने रोकने की कोशिश की, लेकिन शरीर नहीं मान रहा था। उसने मेरी चूत को देखा। “दी… कितनी गीली है,” उसने कहा। मैंने चेहरा छिपा लिया। वो जीभ लगाने लगा। मैं चीख पड़ी। “रोहन… ओह…” वो चाटता रहा। मेरी गांड तक जीभ पहुंचा रहा था। मैं कांप रही थी। orgasm इतनी तेज आया कि मैंने तकिए में मुंह दबा लिया।
उसके बाद वो मेरे ऊपर चढ़ा। उसका लंड सख्त था। वो मेरी चूत पर रगड़ रहा था। “दी… डालूं?” उसने पूछा। मैंने आंसुओं के साथ सिर हिलाया। वो धीरे से अंदर गया। दर्द हुआ, लेकिन मजा ज्यादा था। “आह… रोहन… धीरे…” वो धीरे-धीरे धक्के मारने लगा। मैंने उसकी पीठ नाखूनों से खरोंच दी। हम दोनों पसीने से तर थे। वो तेज होता गया। “दी… तेरी चूत कितनी टाइट है,” उसने कहा। मैंने कहा, “चुप… बस चोद…” वो और जोर से चोदने लगा। हम दोनों झड़ गए। वो मेरे अंदर ही झड़ गया।
उस रात के बाद रोज रात को यही होता। वो मुझे चोदता। कभी मैं उसके लंड को मुंह में लेती। कभी वो मेरी गांड में उंगली डालता। हम नए-नए तरीके आजमाते। लेकिन हर बार बाद में guilt आता। मैं रोती। वो मुझे गले लगाता। “दी… मैं तुझे कभी दुख नहीं दूंगा,” वो कहता। मैं कहती, “ये गलत है रोहन।” वो कहता, “फिर भी मैं तेरे बिना नहीं रह सकता।” हम दोनों जानते थे कि ये राज है। परिवार को पता नहीं चलना चाहिए। लेकिन हमारा प्यार, हमारी चाहत, दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही थी।
एक रात वो बहुत उदास था। मैंने पूछा, “क्या हुआ?” उसने कहा, “दी… अगर कभी शादी की बात आई तो?” मैं चुप हो गई। मेरे मन में भी यही डर था। हम दोनों एक-दूसरे के बिना नहीं जी सकते थे। लेकिन समाज, परिवार… सब कुछ। मैंने उसे गले लगाया। “हम देखेंगे,” मैंने कहा। वो मेरे होंठ चूमने लगा। फिर वही। चुदाई। लेकिन इस बार भावनाएं ज्यादा गहरी थीं। वो मेरी चूत में धक्के मारते हुए रो रहा था। “दी… मैं तुझे हमेशा चाहता हूं,” वो कहता रहा। मैं भी रो रही थी। “मैं भी रोहन… लेकिन ये आसान नहीं है।”
समय बीतता गया। हमारा रिश्ता गहरा होता गया। लेकिन डर भी बढ़ता गया। हर रात चुदाई के बाद हम एक-दूसरे को कसकर पकड़कर सोते। बाहर से सामान्य, अंदर से जलते हुए। मैं जानती थी कि एक दिन ये सब टूट सकता है। लेकिन तब तक, हम दोनों उस जाल में फंसे थे – चुदाई के जाल में। जहां प्यार था, चाहत थी, और एक अनंत दर्द भी।