देवरानी जेठानी के साथ देवर की रात
नेहा की साँसें अभी भी किचन की ठंडी हवा में कंपकंपा रही थीं। सिंक पर रखा गिलास हल्का-सा काँप रहा था, जैसे उसकी उंगलियाँ। रात के ढाई बज चुके थे, घर में वो गहरा सन्नाटा था जो सिर्फ़ दिल्ली की पुरानी कोलोनियों में ही मिलता है—जहाँ दीवारें पतली हैं, लेकिन रिश्ते और भी पतले। ऊपर … पूरी कहानी पढ़ें