कामवाली चुदाई अनीता और उसकी छोटी बहन काजल

अनीता काजल चुदाई – नोएडा की सेक्टर-62 की उस हाई-राइज सोसाइटी में, जहां सुबह की पहली किरण खिड़कियों से छनकर फर्श पर गिरती और शाम को शहर की लाइट्स बालकनी को रोशन करतीं, मेरा फ्लैट 11वीं मंजिल पर था। मैं, रोहन, 31 साल का, एक फाइनेंशियल फर्म में वरिष्ठ पद पर। घर अकेला था – मां-बाप रिटायरमेंट के बाद गोवा में बस गए थे, बहन शादीशुदा दिल्ली में अलग। घर की देखभाल के लिए दो कामवालियां रखी थीं – अनीता और काजल। अनीता 43 की, मजबूत कद-काठी वाली, अनुभवी, हमेशा हंसमुख लेकिन आंखों में एक गहराई। काजल उसकी छोटी बहन, 25 की, पतली कमर, लंबे काले बाल, चेहरा इतना निखरा कि देखते ही मन भटक जाता। दोनों सुबह 7:30 बजे आतीं, दोपहर में थोड़ा ब्रेक लेकर शाम 7 बजे तक रहतीं। लेकिन पिछले कुछ महीनों से शाम को रुकने की आदत पड़ गई थी – “साहब, आज बस थक गई हूं, रुक जाऊं?”

शुरुआत एक जनवरी की सर्द रात से हुई। बाहर हवा इतनी तेज थी कि खिड़कियां खड़खड़ा रही थीं। अनीता ने चाय बनाते हुए कहा, “साहब, आज बहुत ठंड है। काजल को घर छोड़ना मुश्किल होगा। क्या हम दोनों यहीं रुक जाएं?” मैंने बिना सोचे कहा, “हां, रह जाओ। गेस्ट रूम में सो जाना।” लेकिन गेस्ट रूम की हीटर काम नहीं कर रही थी। अनीता ने हल्के से मुस्कुराकर कहा, “साहब, ठंड में अकेले सोना अच्छा नहीं लगता। क्या हम आपके कमरे में ही… फर्श पर?” मैंने हंसकर मना किया, लेकिन वो जिद पर अड़ी रहीं। आखिरकार मैंने कहा, “ठीक है, बेड पर ही सो लो। मैं सोफे पर ठीक हूं।” अनीता ने कहा, “नहीं साहब, आप बेड पर। हम तीनों साथ में सो लें, ठंड कम लगेगी।”

रात के 12:30 हो चुके थे। मैं बेड के बीच में लेटा था। अनीता बाईं तरफ, काजल दाईं तरफ। कंबल के नीचे तीनों के शरीर की गर्माहट महसूस हो रही थी। अनीता की साड़ी थोड़ी सरक गई थी, उसकी मोटी जांघ मेरी जांघ से छू रही थी। काजल की नाइट गाउन में उसकी सांसें मेरी गर्दन पर लग रही थीं। मैंने आंखें बंद कीं, लेकिन नींद नहीं आ रही थी। मन में विचार घूम रहे थे – “ये क्या हो रहा है? वो मेरी कामवालियां हैं। लेकिन ये निकटता… ये गर्मी…” अनीता ने धीरे से करवट बदली। उसका हाथ मेरी कमर पर आ गया। वो जाग रही थी। “साहब… आप सो नहीं पा रहे?” उसने फुसफुसाया। मैंने कहा, “नहीं।” काजल भी जाग गई। उसने मेरी तरफ मुंह किया। “अंकल… मुझे भी ठंड लग रही है।”

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धीरे-धीरे बातें शुरू हुईं। अनीता ने कहा, “साहब, आप अकेले रहते हैं। कभी ऐसा लगता है कि कोई साथ हो?” मैंने कहा, “हां… कभी-कभी बहुत।” काजल ने हल्के से मेरी छाती पर हाथ रख दिया। उसकी उंगलियां कांप रही थीं। अनीता का हाथ मेरे पेट पर सरक गया। वो मेरे लंड के पास पहुंच गया। वो पहले से ही सख्त था। “साहब… आप भी महसूस कर रहे हैं न?” अनीता ने कहा। मैं चुप रहा। काजल ने मेरी शर्ट का बटन खोला। उसकी ठंडी उंगलियां मेरी गर्म त्वचा पर। मैंने अनीता के होंठ चूम लिए। वो तुरंत जवाब देने लगी। उसकी जीभ मेरी जीभ से खेल रही थी। काजल ने मेरी गर्दन पर किस किया। “अंकल… मुझे भी…”

अनीता ने अपनी साड़ी के पल्लू को सरका दिया। उसके भारी, गोल स्तन बाहर आए। मैंने उन्हें दोनों हाथों से पकड़ा। वो नरम लेकिन भरे हुए थे। मैंने निप्पल को मुंह में लिया। अनीता सिसकारी। “आह… साहब… जोर से चूसो…” काजल ने अपनी नाइट गाउन उतार दी। उसके छोटे, सख्त स्तन। मैंने एक हाथ से उन्हें दबाया। वो कांप उठी। “अंकल… ओह… अच्छा लग रहा है…” अनीता नीचे सरकी। मेरे पैंट को नीचे किया। मेरा लंड बाहर आया। वो उसे मुंह में ले लिया। “साहब… कितना गरम और मोटा…” काजल भी झुकी। दोनों बारी-बारी चूसने लगीं। उनकी जीभें मेरे लंड पर नाच रही थीं। मैं उनके बालों में उंगलियां फेर रहा था।

फिर मैंने अनीता को पीठ के बल लिटाया। उसकी साड़ी पूरी ऊपर। चूत गीली, बालों से ढकी। मैंने जीभ से छुआ। वो चीख पड़ी। “साहब… आह… अंदर तक चाटो… मेरी चूत जल रही है…” काजल मेरे लंड को सहला रही थी। फिर मैंने काजल को अपनी तरफ खींचा। उसकी चूत छोटी, गुलाबी, पहले से गीली। मैंने लंड उस पर रगड़ा। “अंकल… डालो न…” मैं धीरे से अंदर गया। वो दर्द से कराही, “अंकल… धीरे… लेकिन मत रुको…” अनीता ने काजल के होंठ चूमे। मैं धीरे-धीरे धक्के मारने लगा। काजल की सिसकारियां बढ़ीं। “अंकल… तेज… चोदो मुझे जोर से…” अनीता ने कहा, “बेटी, साहब को मजा दे।”

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फिर अनीता की बारी। मैंने उसे घुटनों के बल किया। उसकी मोटी गांड हिल रही थी। मैंने लंड उसकी चूत में डाला। “आह… साहब… फाड़ दो मेरी चूत… पूरी रात चोदो…” काजल नीचे आ गई। अनीता की चूत चाट रही थी और मेरी गांड सहला रही थी। मैं और तेज हो गया। कमरे में सिर्फ हमारी सांसें, चपड़-चपड़ की आवाज और सिसकारियां। हम तीनों एक साथ झड़े – पहले काजल, फिर अनीता, फिर मैं अनीता के अंदर।

उस रात के बाद हर दिन कुछ न कुछ नया होता। सुबह किचन में अनीता को पीछे से पकड़कर चोदता। काजल दरवाजे पर खड़ी देखती और फिर शामिल हो जाती। “अंकल… मुझे भी…” दोपहर में बाथरूम में तीनों नंगे। अनीता कहती, “साहब… आपने हमें जीना सिखाया।” काजल कहती, “अंकल… तुम्हारे बिना अब सोच भी नहीं सकती।” लेकिन हर बार बाद में एक डर लगता। “अगर कोई देख ले? सोसाइटी, पड़ोसी, क्या होगा?” फिर भी रात होते ही वो चाहत लौट आती।

एक रात बाहर बर्फ जैसी ठंड थी। हम बेड पर। अनीता ने कहा, “साहब… आज काजल की गांड आजमाओ। वो कह रही है।” काजल शरमा गई। मैंने लुब्रिकेंट लगाया। पहले उंगली डाली। वो सिहर उठी। “अंकल… दर्द…” अनीता ने कहा, “आराम से… पहले मजा आएगा।” फिर मैंने लंड रखा। धीरे-धीरे अंदर। काजल चीखी, लेकिन फिर सिसकारी में बदल गई। “अंकल… अब अच्छा लग रहा है… और अंदर…” अनीता मेरी पीठ चूम रही थी। हम तीनों फिर जुड़े। orgasm इतना तीव्र कि सब थककर लेट गए।

समय बीतता गया। हमारा रिश्ता सिर्फ चुदाई नहीं रहा। भावनाएं गहरी हो गईं। अनीता कहती, “साहब… हम दोनों आपके साथ खुश हैं।” काजल कहती, “अंकल… ये प्यार है, बस छिपा हुआ।” मैं भी महसूस करता था। लेकिन guilt भी था। “ये गलत रास्ता है।” फिर भी हम रुक नहीं पाए। नोएडा की इन ऊंची दीवारों के बीच हमारा गुप्त संसार था। जहां बाहर सब सामान्य दिखता, अंदर हम जलते रहे – स्पर्श में, चाहत में, और उस अनकहे बंधन में जो शायद कभी टूटे नहीं। कभी-कभी सोचता हूं कि ये कितने दिन चलेगा। लेकिन उस पल में, हम बस जी रहे थे। तीन शरीर, तीन दिल, एक ही आग में।

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