भिखारन की चुदाई गर्म दोपहरी में

मेरा नाम संदीप है। मैं दिल्ली के पास एक छोटे से कस्बे में रहता हूँ। उम्र 27 साल, और नौकरी की तलाश में दिनभर इधर-उधर भटकता हूँ। मेरा घर गली के आखिरी छोर पर है, जहाँ दोपहर में सन्नाटा छा जाता है। गर्मी के दिन थे, और सूरज आग उगल रहा था। मैं उस दिन घर लौटा तो पसीने से तर था। मेरी शर्ट चिपक रही थी, और मैं बस नहाने की सोच रहा था। लेकिन तभी मेरी नजर गली के मोड़ पर पड़ी। वहाँ एक भिखारन बैठी थी।

वो कोई 25-30 की होगी। उसका नाम नहीं पता था, लेकिन गली वाले उसे “गुड़िया” कहते थे। उसका जिस्म गंदे कपड़ों में ढका था, लेकिन उसकी खूबसूरती छुप नहीं रही थी। गोरी चमड़ी, काले बाल जो बिखरे हुए थे, और वो चूचियाँ जो फटे ब्लाउज में कैद होने को तैयार नहीं थीं। उसकी गांड जमीन पर टिकी थी, और उसकी टाँगें थोड़ी खुली हुई थीं। मैंने उसे पहले भी देखा था, लेकिन उस दिन गर्मी की वजह से उसका ब्लाउज पसीने से भीगा था, और उसकी चूचियाँ साफ झाँक रही थीं। मेरे कदम अपने आप रुक गए।

मैं उसके पास गया। “पानी चाहिए?” मैंने पूछा। वो मेरी ओर देखकर हँसी। उसके होंठ सूखे थे, लेकिन फिर भी रसीले लग रहे थे। “हाँ, साहब, बहुत प्यास लगी है,” उसने कहा। उसकी आवाज में एक अजीब सी मिठास थी। मैं घर से पानी की बोतल लाया और उसे दिया। वो गटागट पी गई। पानी उसके मुँह से नीचे टपका, और उसकी चूचियों पर गिरा। मैं उसे देखता रहा। “साहब, आप अच्छे हैं,” उसने कहा और मेरे करीब सरक आई। उसकी साँसें मेरे चेहरे पर पड़ रही थीं, और मेरे जिस्म में गर्मी बढ़ गई।

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“तू यहाँ गर्मी में क्यों बैठी है?” मैंने पूछा। वो हँसी और बोली, “साहब, मेरे पास ठिकाना कहाँ? जो मिलता है, उसी से गुजारा है।” उसकी आँखों में एक भूख थी—खाने की नहीं, कुछ और की। मैंने कहा, “मेरे घर चल, थोड़ा आराम कर ले।” वो चौंकी, लेकिन फिर मुस्कुराई। “साहब, आप कुछ और चाहते हैं न?” उसने शरारत से कहा। मैं हँसा और बोला, “जो तू दे सके, वो ले लूँगा।” वो उठी, और उसकी गांड की मटक देखकर मेरे दिल की धड़कन तेज हो गई।

मैं उसे अपने घर ले आया। दरवाजा बंद किया। गर्मी से मेरा जिस्म पसीने से तर था, और वो भी कम नहीं थी। उसका ब्लाउज पसीने से चिपक गया था, और उसकी चूचियाँ बाहर आने को बेताब थीं। “साहब, यहाँ बहुत गर्मी है,” उसने कहा और अपने ब्लाउज का किनारा उठाया। उसकी चूचियाँ मेरे सामने थीं—गोरी, टाइट, और पसीने से चमक रही थीं। मैंने कहा, “गुड़िया, तू तो आग है।” वो हँसी और मेरे पास आई। “साहब, ये आग आपको चाहिए?” उसने फुसफुसाया। मेरे जिस्म में बिजली दौड़ गई।

मैंने उसे अपनी बाँहों में खींच लिया। उसके होंठ मेरे होंठों से टकराए। वो सूखे थे, लेकिन गर्म थे। मैंने उन्हें चूसा, और वो सिसक उठी— “उफ्फ, साहब, ये क्या कर रहे हो?” मेरे हाथ उसके ब्लाउज पर गए। मैंने उसे फाड़ दिया, और उसकी चूचियाँ आजाद हो गईं। मैंने उन्हें दबाया, और वो “आह्ह” कर उठी। “साहब, धीरे, मेरी चूचियाँ तो आपके लिए ही हैं,” उसने कहा। मैंने उसकी चूचियों को चूसा। उसकी सिसकियाँ तेज हो गईं— “उफ्फ, साहब, तू मुझे पागल कर देगा।” मेरे हाथ उसकी गांड पर चले गए। वो गंदी स्कर्ट में ढकी थी, लेकिन मुलायम थी। मैंने उसे मसला और कहा, “गुड़िया, तेरी गांड तो मखमल है।” वो बोली, “साहब, इसे चोद लो।”

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मैंने उसकी स्कर्ट उतार दी। वो मेरे सामने नंगी थी। उसकी चूत पर हल्की झाँटें थीं, और वो गीली हो रही थी। मैंने अपने कपड़े फेंके। मेरा लंड बाहर आया—लंबा, सख्त, और गर्मी से तना हुआ। उसने उसे देखा और बोली, “साहब, ये तो मेरी चूत को फाड़ देगा।” मैंने हँसकर कहा, “गुड़िया, तेरी चूत इसके लिए ही तरस रही है।” मैंने उसे फर्श पर लिटाया। दोपहर की गर्मी में फर्श ठंडा था, लेकिन हमारा जिस्म आग की तरह जल रहा था। मैंने उसकी टाँगें फैलाईं और उसकी चूत पर अपनी जीभ रख दी। वो चिल्ला उठी— “आह्ह, साहब, ये क्या कर रहे हो? मुझे मार डालोगे।” मैंने उसकी चूत को चाटा, और वो सिसक रही थी— “उफ्फ, साहब, चोद दे मुझे।”

उसकी चूत टपक रही थी। मैंने अपना लंड उसकी चूत पर रगड़ा। वो गीली थी, गर्म थी। मैंने एक जोरदार धक्का मारा, और मेरा लंड उसकी चूत में घुस गया। वो चीख पड़ी— “आह्ह, साहब, मेरी चूत फट गई।” मैंने कहा, “गुड़िया, अभी तो मजा शुरू हुआ है।” मैंने उसे चोदना शुरू किया। मेरा लंड उसकी चूत को चीर रहा था, और उसकी चूचियाँ उछल रही थीं। वो चिल्ला रही थी— “आह्ह, साहब, और तेज। मेरी चूत को फाड़ दो।” मैं पागलों की तरह उसे चोद रहा था। उसकी सिसकियाँ गर्म हवा में गूँज रही थीं— “उफ्फ, साहब, तू मेरा मर्द है।”

गर्मी में हमारा पसीना टपक रहा था। मैंने उसे पलटा और उसकी गांड को ऊपर किया। उसकी गांड मेरे सामने थी—गोरी, गोल, और पसीने से चमक रही थी। मैंने उसकी चूत में पीछे से लंड डाला। वो चिल्लाई— “आह्ह, साहब, मेरी गांड को भी चोद दो।” मैंने उसकी गांड पर थप्पड़ मारा और उसकी चूत को चोदता रहा। उसकी सिसकियाँ तेज हो गईं— “उफ्फ, साहब, मेरी चूत को भर दो।” मैंने उसे जोर-जोर से चोदा। उसका जिस्म काँप रहा था, और मेरी साँसें उसकी गर्दन पर पड़ रही थीं।

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दोपहर ढल रही थी, लेकिन हमारी चुदाई रुक नहीं रही थी। मैंने उसे गोद में उठाया और दीवार से सटाकर चोदा। उसकी चूचियाँ मेरे सीने से चिपक रही थीं, और उसकी चूत मेरे लंड से भर गई थी। वो चिल्ला रही थी— “आह्ह, साहब, मेरी चूत सूज गई।” मैंने कहा, “गुड़िया, तूने मुझे पागल कर दिया।” मैंने अपना माल उसकी चूत में छोड़ दिया, और वो निढाल होकर मेरे सीने से चिपक गई। हम दोनों पसीने से तर थे। उसकी साँसें अभी भी गर्म थीं।

उसके बाद वो उठी। उसने अपने कपड़े पहने और बोली, “साहब, ये सुख मैं कभी नहीं भूलूँगी।” मैंने उसकी चूचियों को सहलाया और कहा, “गुड़िया, तेरी चूत ने मुझे जन्नत दिखा दी।” वो हँसी और बोली, “साहब, फिर बुलाना।” वो चली गई, लेकिन उसकी चुदाई की गर्मी मेरे जिस्म में बसी रही। उस गर्म दोपहरी में उस भिखारन ने मुझे वो आग दी, जो मैं कभी नहीं भूल सकता। उसकी चूचियाँ, उसकी गांड, उसकी चूत—हर चीज मेरे दिमाग में छप गई। वो एक भिखारन थी, लेकिन उसने मुझे मालिक बना दिया।