अधूरी बातों का एक अधूरा शाम
राहुल उस शाम बस ऐसे ही घर से निकल आया था। माँ ने दरवाज़े पर खड़े होकर कहा था, “जा बेटा, थोड़ा हवा खा ले। रोज़-रोज़ कमरे में बंद रहता है, चेहरा देखने लायक नहीं रह गया।” वह हल्के से मुस्कुराया था, कुछ कहा नहीं। बाहर निकलते ही शहर की सड़कें लगीं, वही पुरानी गलियाँ, … पूरी कहानी पढ़ें